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Friday, 26 May 2017

इंटरनेशनल नार्थ - साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर


चीन-पाकिस्तान गठजोड़( OBOR )परियोजना को भारत-रूस के संयुक्त( #INSTC)परियोजना से करारा जवाब
👉 OBOR - वन बेल्ट वन रोड
👉 INSTC - इंटरनेशनल नार्थ - साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर

पिक्चर में लाल लाइन से रूस और भारत के बीच में ये नया रास्ता INSTC दिखाया गया है। 
 मुसीबत की घड़ी में पुराने दोस्त ही काम आते हैं। कुछ यही साबित किया है रूस ने। पाक के कब्जे वाले कश्मीर से होते हुए चीन ने वन बेल्ट-वन रोड प्रोजेक्ट पर काम कर भारत को दबाव में लाने की कोशिश की। मगर, अब चीन को रूस के साथ मिलकर भारत करारा जवाब देने की तैयारी कर रहा है। अब दोनों देश INSTC नामक उस परिवहन परियोजना को जोर-शोर से आगे बढ़ाने में जुट गए हैं, जिसकी परिकल्पना सितंबर 2000 में हुई थी।

* यह प्रोजेक्ट कितना अहम है, इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंद महासागर और फारस की खाड़ी को ईरान के जरिए कैस्पियन सागर से जोड़ा जाएगा। और फिर रूस से होते हुए उत्तरी यूरोप तक पहुंच बन जाएगी। भारत के सामरिक और व्यापारिक हितों के लिहाज से इस प्रोजेक्ट को विशेषज्ञ बहुत महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

👉 क्या होगा प्रोजेक्ट से लाभ

* विदेश मामलों के विशेषज्ञ ए सतोब्दन इस प्रोजेक्ट के कई लाभ गिनाते हैं। कहते हैं कि इस परियोजना में ईरान के चाबहार बंदरगाह की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि अन्तरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कोरिडोर (आईएनएसटीसी) के अमल में आने पर माल को पहुंचाने के समय और लागत में करीब 40 प्रतिशत की कमी आएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि हमें चाबहार बंदरगाह का अधिकतम उपयोग करना चाहिए, इससे हमारे लिए संपूर्ण मध्य एशिया के द्वार खुल जाएगा।

* इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस रिसर्च एंड एनालिसिस (आईडीएसए) से जुड़े विशेषज्ञ एम एस रॉय की एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एवं मध्य एशिया में भारत के सामरिक हितों और दक्षिण, मध्य एवं पश्चिम क्षेत्र के बीच वृहद आर्थिक एवं उर्जा सहयोग की जरूरत को देखते हुए विस्तारित पड़ोस की अवधारणा के लिए आईएनएसटीसी परियोजना महत्वपूर्ण है।

👉 जानिए क्या है परियोजना

* साल 2005 से 2012 तक इस परियोजना के विकास की रफ्तार काफी सुस्त रही। इस वर्ष अप्रैल में इस परियोजना को आगे बढ़ाने की पहल की गई है। 18 मई 2017 को भारत से रूस तक आईएनएसटीसी..एक्सप्रेस कारिडोर के विषय पर एक सम्मेलन हुआ। इस दौरान चाबहार बंदरगाह के अधिकतम उपयोग और इस बहुपक्षीय गलियारे से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई।

* भारत और रूस के राजनयिक संबंधों की 70वीं वषर्गांठ के उपलक्ष में आईएनएसटीसी परियोजना को काफी महत्व दिया जा रहा है। मोदी कुछ ही समय बाद रूस की यात्रा पर जाने वाले हैं। ईरान, रूस, भारत के संयोग वाले बहुपक्षीय परिवहन कार्यक्रम अन्तरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कोरिडोर का महत्व काफी बढ़ गया है जो हिन्द महासागर और फारस की खाड़ी को ईरान के जरिये कैस्पियन सागर से जोड़ेगा और फिर रूस से होते हुए उत्तरी यूरोप तक पहुंच बनायेगा। 2013 में इसका पहला ड्राई रन संचालित किया गया

🚨 उत्तर-दक्षिण गलियारा जल्दी ही स्वेज़ नहर की जगह ले सकता है

* बाकू में 8 अगस्त को आयोजित त्रिपक्षीय शिखर सम्मेलन में अज़रबैजान, ईरान और रूस ने यह संकेत दिया है कि वे रणनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना और उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारा परियोजना के विकास में तेजी लाना चाहते हैं।

* पोलितरशिया डॉट कॉम नामक रूसी ऑनलाइन मीडिया आउटलेट ने इस मामले पर अपनी राय देते हुए लिखा है "रूस से होकर जल्दी ही बड़ी भारी मात्रा में माल की [नए रेशम मार्ग के जरिए] न केवल पूर्व से पश्चिम की ओर आवाजाही होगी, बल्कि दक्षिण से उत्तर की ओर भी होगी। रूस दक्षिण एशिया के देशों के लिए द्वार बनने जा रहा है"।

* उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारा एक समन्वित जलपोत, रेल और सड़क मार्ग है, जिसे यूरेशिया के भीतर पारगमन और विदेशी व्यापारिक माल की आवाजाही बढ़ाने के उद्देश्य से बनाया जा रहा है।

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* हिंद महासागर व फारस की खाड़ी से कैस्पियन सागर तथा उससे आगे के इलाकों और फिर वहाँ से रूस के रास्ते उत्तरी व पश्चिमी यूरोप को जोड़ने के लिए सितंबर 2000 में साँक्त पितेरबुर्ग में रूस, ईरान और भारत ने एक समझौता किया था। 2002 में इस समझौते को इसके संस्थापक देशों का अनुसमर्थन प्राप्त हुआ।

* यह नया गलियारा 7 हजार 2 सौ किलोमीटर (4 हजार 4 सौ 78 मील) लंबा है। परियोजना के सहभागी देशों को इससे अनेक मूर्त फायदे मिलने वाले हैं।

* हालाँकि अन्य परिवहन मार्गों, विशेषकर स्वेज़ नहर के मुकाबले इस गलियारे से सबसे बड़ा लाभ यह होने वाला है कि इससे परिवहन दूरी घटकर पहले से अधिक से अधिक आधी रह जाएगी। इस तरह आवाजाही में लगने वाले समय और लागत में काफी कमी आएगी।

* पोलितरशिया डॉट कॉम के अनुसार उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारे को स्वेज़ नहर का प्रतिस्पर्धी माना जा रहा है। पोलितरशिया डॉट कॉम आगे लिखता है कि यूरोप और एशिया के आर्थिक परिक्षेत्रों को जोड़ने वाली स्वेज़ नहर माल की आवाजाही बढ़ाने की जरूरतों को पूरा करने में विफल रही है।

* कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि इस समय समुद्री मार्ग से होने वाले कुल वैश्विक व्यापार का लगभग दस प्रतिशत हिस्सा स्वेज़ नहर से होकर गुजरता है। हालाँकि ईरान पर लगे प्रतिबंधों के हटने के कारण स्वेज़ नहर से गुजरने वाले जलपोतों की संख्या में बड़ी तेज़ बढ़ोत्तरी हो सकती है। ऐसा लगता है कि जलपोतों की आवाजाही में यह बढ़ोत्तरी शायद स्वेज़ नहर की क्षमता के भीतर नहीं रह जाएगी।

* ऐसा होने पर स्वेज़ नहर वैश्विक व्यापार के लिए "अवरोध का कारण" बन जाएगी। उस स्थिति में यह नया उत्तर-दक्षिण गलियारा स्वेज़ नहर पर बढ़ते बोझ को हल्का करने में सक्षम होगा।

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उल्लेखनीय है कि उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारे का 3 हजार किलोमीटर (एक हजार 8 सौ 64 मील) लंबा हिस्सा रूसी जमीन पर है। इस गलियारे का सड़क वाला खंड रूस-फिनलैंड सीमा से लेकर कैस्पियन सागर तक रूसी रेलवे के समानांतर गुजरता है।

* आज स्थिति यह है कि उत्तर-दक्षिण गलियारे के लिए अज़रबैजान और ईरान के बीच लगभग एक सौ 72 किलोमीटर लंबे रेलमार्ग के निर्माण का काम अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है।

* हालाँकि रिया नोवोस्ती के अनुसार अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयिफ़ ने बाकू में हुई बैठक के दौरान अपने समपदस्थों को भरोसा दिलाया कि इस अधूरे रेलमार्ग का काम जल्दी ही पूरा कर लिया जाएगा।

* लेकिन इसके बावजूद 2015 में उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारे के जरिए 73 लाख टन विदेशी व्यापारिक माल की ढुलाई हुई, जिसका मतलब यह है कि माल ढुलाई में 2014 की तुलना में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

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* तेहरान विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध के सह-आचार्य जहाँगीर करामी ने वल्दायक्लब डॉट कॉम से कहा "उत्तर-दक्षिण गलियारा परियोजना ने इस क्षेत्र के देशों के बीच सहयोग की नींव रखी है ताकि क्षेत्रीय विकास के लक्ष्य की प्राप्ति हो सके।

* यह परिवहन मार्ग भारत को एक अधिक सुरक्षित व छोटे रास्ते के जरिए यूरोप से जोड़ता है। ईरान, अज़रबैजान और रूस के लिए भी यह परियोजना बहुत महत्वपूर्ण है"।

* यह बात ध्यान रखने लायक है कि उत्तर-दक्षिण गलियारा परियोजना में रूस, ईरान, भारत तथा अज़रबैजान के अलावा अरमेनिया, बेलारूस, यूक्रेन, यूनान, बल्गारिया, जार्जिया, किर्गिज़िस्तान, तजाकिस्तान, कज़ाखस्तान, पाकिस्तान, इराक, ओमान, सीरिया और तुर्की के भी शामिल होने की आशा है।

* पोलितरशिया डॉट कॉम ने लिखा है कि चूँकि तुर्की के अज़रबैजान के साथ बड़े गहरे संबंध हैं, इसलिए इस नए मार्ग से तुर्की को बहुत फायदा हो सकता है। वहीं दूसरी ओर, इसके कारण रूस और तुर्की के बीच तनाव में भी कमी आएगी।

* पोलितरशिया डॉट कॉम ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि 2015 में एक "जोखिम भरी रूस-विरोधी" परियोजना में रूस को किनारे करते हुए चीन से तुर्की तक एक मार्ग बनाने का विचार रखा गया था। लेकिन अब ऐसा लगता है कि तुर्की के लिए उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारे की तुलना में यह जोखिम भरी परियोजना उतनी आकर्षक नहीं रह जाएगी।

* इस बीच इस नए परिवहन गलियारे के क्रियान्वयन को देखते हुए काकेशिया और पश्चिमी एशिया की सुरक्षा का महत्व काफी बढ़ गया है। सीरिया में रूस ने अपने स्थायी वायुसैनिक अड्डे की स्थापना की है।

* इस अड्डे की न केवल इस क्षेत्र में रूस द्वारा चलाए जाने वाले सैन्य तथा मानवीय अभियानों में ही महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी, बल्कि यह पश्चिम एशिया के टिकाऊ आर्थिक विकास की कुंजी के रूप में भी काम करेगा।

👉 परिणाम :

नए रेशम मार्ग (एक प्रदेश, एक मार्ग) परियोजना और उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारा परियोजना के कारण यूरेशिया के देशों के एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा, जिससे यूरेशिया की क्षेत्रीय शक्तियों का न केवल तेज़ आर्थिक विकास होगा बल्कि पूरे यूरेशियाई क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा की स्थिति भी मजबूत होगी।
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